This blog is intended to share positive messages that inspire us towards wholistic solutions. We will post articles, discussions, news and creative writing etc. that are universal in nature and direct us towards actualizing our innate desires of
lasting happiness and prosperity.

WISH FOR UNIVERSAL GOODNESS

MAY EARTH BE HEAVEN, MAY HUMANKIND BE AWAKENED,
MAY
DHARMA* PREVAIL, MAY GOODNESS ARISE FOREVER.
-A. Nagraj Sharma
* Dharma: Inseparable aspect (innateness) of any entity. Dharma of humankind is lasting happiness!

Saturday, April 24, 2010

जनम-मरण

जनम और मरण आदमी के लिए दो घटनाएँ हैं | ये दोनों घटनाएँ हर आदमी के लिए जरूरी है | जितने भी आदमी हैं उन सब का जन्म तो हो ही चुका है | उन सबका मरण भी होगा ही | संसार में बहुत सारे जनम और मरण नित्य होते रहते हैं |

हमारा जन्म हो ही चुका है | इसके बारे में हमें कुछ करना-धरना नहीं है | मरण न हो ऐसा हो नहीं सकता इसलिए मरण न होने के लिए भी कुछ करना-धरना नहीं है |

मरण कब, कहाँ और किस तरह होगा इसके बारे में कोई जानकारी मानव परंपरा में अभी नहीं है | किसी भी पल किसी भी जगह पर किसी भी प्रकार से किसी का भी मरण हो सकता है | जन्म और मरण दोनों ही निश्चित घटनाएँ है | ऐसा ही प्रकृति का नियम है |

अस्तित्व स्वयं शुभ ही है | अस्तित्व में होने वाली हर घटना शुभ का ही प्रकाशन है | इसलिए मनुष्यों का मरण भी शुभ ही घटनाएँ हैं |

जन्म को तो मनुष्य शुभ मानते ही आए परन्तु मरण को शुभ मानने को तैयार नहीं हैं | जन्म-मरण तो परस्पर पूरक हैं अतः दोनों ही शुभ है |
शरीर की आयु सौ साल के आस-पास हो जाए तो मरण की स्वीकृति सी लगती है फिर भी ऐसे मरण की सूचना भी "शोक सन्देश" के रूप में दी जाती है तथा कहा जाता है कि इस मरण से परिवार और समाज ने कुछ खो दिया है |

शरीर की आयु सौ साल से काफी कम होने पर मरण हो जाने को सभी अशुभ मानते हैं | आजकल किसी भी आयु में किसी के भी मरने की संभावना बनी ही रहती है | उधर मनुष्यों में यह मान्यता गहरी बनी हुई है कि सौ साल तक शरीर का स्वास्थ्य बना रहना ही उचित है | मान्यताएं अपनी जगह हैं और घटनाएं अपनी जगह |

रोगी शरीर को केवल केवल जिन्दा बनाए रखना तो कोई कार्यक्रम नहीं हुआ | विचार करने का मुद्दा यह है कि जब तक शरीर बना हुआ है तब तक इसका सदुपयोग और इसकी सम्भाल कैसे की जाए ? अतः कितनी आयु शेष है के बजाए यदि यह विचार करें कि जो भी आयु शेष है उसका पूरा-पूरा सदुपयोग किया जाए और तब तक शरीर का उपयुक्त पोषण और संरक्षण किया जाए तो सार्थकता है |

इस दृष्टि से अपने बार में विचार करता हूँ तो-
(क) मेरे शरीर की शेष आयु का सदुपयोग कैसे हो ?
(ख) इस दौरान शरीर की सार-सम्भाल कैसे हो ?
पहले बिंदु की पूरकता में ही दूसरे बिंदु की सार्थकता है | शरीर की केवल देख-रेख होती रहे और कोई सदुपयोग न हो ये बेकार की बात है | शरीर का सदुपयोग होता रहे इसके लिए उसकी देखभाल जरूरी है |

मैं मनुष्य हूँ | वास्तविकता को समझना व समझाना ही मेरा मुख्या कार्य है | अतः सदुपयोगिता के रूप में यही निकालता है कि-
(१) जो जिज्ञासा है उसे तृप्त करने के लिए अध्ययन करता रहूँ तथा
(२) जो समझ में आ गया है उसका प्रकाशन करता रहूँ, व्याख्या करता रहूँ और उसके अनुसार जीता रहूँ |
(३) उपरोक्त कार्य के लिए शरीर की श्रेष्ठतम स्थिति बनाकर रखूँ |

जन्म की तरह मरण भी सभी मनुष्यों के लिए जरूरी घटना है इस सच्चाई को सभी जानते हैं और इसकी याद दिलाने के लिए रोज हमारे चारों तरफ किसी न किसी के साथ मरण की घटना घटित होती रहती है | हम सब तरह-तरह से इन घटनाओं को वर्णन भी करते रहते हैं | इन अवसरों पर प्रायः मनुष्य अपने-अपने कार्यों और भावनाओं का अवलोकन भी करते हैं तथा उनकी निरर्थकता को मानते हैं परन्तु शीघ्र ही पूर्ववत जीने लगते हैं | एक भाई ने एक बार यमुना किनारे चिता जलाते हुए कहा था कि मैं सैकड़ो बार शमशान घाट आ चुका हूँ | यहाँ आकर बहुत कुछ सोचता हूँ परन्तु लौटते समय ऊपर सड़क पर पहुँचते ही पूर्ववत ही जीने लगता हूँ | इसी से मिलती जुलती घटनाएँ सबके साथ बितती रहती है |

जिनका शरीर छूट जाता है उनके बारे में हम कुछ कह नहीं पाते हैं जो रह जाते हैं वो थोड़ी देर के लिए अफसोस करके पूर्ववत हो जाते हैं |

अनेक संतों और विद्वानों ने इन घटनाओं के आधार पर विभिन्न प्रकार से मनुष्यों को चेतावनी भी दी है | और किसी क्षण भी मरण हो सकता है इसको याद रखने के लिए आग्रह किया है आश्चर्य भी प्रकट किया है कि क्यों मनुष्य मरण को देखकर भी अनदेखा करते जाते हैं |

प्रश्न यही उठता है कि याद करके भी क्या करें ? क्या मौत के दिन जैसा सन्नाटा बना कर रखें ? क्या निरंतर रोते और पछताते ही रहें ? ऐसा तो हो नहीं सकता | कार्य तो हमको जीने के लिए और जीवन को अभिव्यक्त करने के लिए ही करने हैं |

श्रद्धेय स्व० यशपाल सत्य जी की डायरी से

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